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Skanda Sashti 2024: स्कंद षष्ठी व्रत, कथा और इसका पौराणिक महत्व

स्कंद षष्ठी का व्रत करने से निसंतान दंपत्ति को हो सकती है संतान की प्राप्ति, जानिए क्या है इसका पौराणिक महत्व


जिस तरह मासिक शिवरात्रि का पर्व हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि में मनाया जाता है, उसी तरह हर महीने की शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दौरान शिव के पुत्र भगवान कार्तिकेय से जुड़ा एक खास पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को स्कंद षष्ठी के नाम से जाना जाता है। इस पर्व में भगवान कार्तिकेय की पूजा करने के साथ ही व्रत भी रखा जाता है। भगवान कार्तिकेय का एक नाम स्कंद कुमार भी है, इसलिए इस पर्व को स्कंद षष्ठी कहा जाता है। स्कंद षष्ठी को कई जगह कांडा षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। भाद्रपद माह में पड़ने वाली ये स्कंद षष्ठी धार्मिक मान्यताओं में काफी समृद्ध बताई गई है। कहा जाता है कि इस षष्ठी पर पूजा करने से ब्रह्महत्या के पाप से भी मुक्ति मिल सकती है। आइए जानते हैं स्कंद षष्ठी की पूरी कहानी को, साथ ही जानेंगे इसकी पूजा विधि और शुभ मुहूर्त के साथ इसकी महत्ता को भी …… 


स्कंद षष्ठी कथा : 

स्कंद पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार, शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि में ही भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ था, जिन्होंने तारकासुर नाम के दैत्य का वध किया था। इसी उपलक्ष्य में स्कंद षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। स्कंद पुराण की कथा के अनुसार एक बार तारकासुर नाम के दैत्य ने भगवान शिव की घोर तपस्या कर उनसे ये वरदान प्राप्त किया कि उसे शिव के पुत्र के अलावा कोई और ना मार सके। भगवान शिव ने तारकासुर को तथास्तु का वरदान दे दिया लेकिन कुछ दिनों बाद ही माता सती ने आत्मदाह कर लिया और भगवान शिव के कोई संतान न हो सकी। माता सती के आत्मदाह के बाद से शिव वैरागी होकर समाधि में लीन हो गए और इधर तारकासुर ने तीनों लोक में अत्याचार करना शुरु कर दिए। तारकासुर के अत्याचार को सहन न कर पाने के बाद देवतागण पहले ब्रह्मा जी के पास मदद के लिए गए। ब्रह्मा जी से उन्हें कोई सहायता तो नहीं मिली लेकिन उन्होंने बताया कि तारकासुर का वध केवल शिव पुत्र के हाथों ही हो सकता है। अब समस्या यह थी कि वैरागी भगवान शिव को गृहस्थ कैसे बनाया जाए, ताकि उनका माता पार्वती (माता सती की अवतार) से विवाह हो जो की शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप कर रही थीं। शिव को वैराग्य से बाहर लाने के लिए प्रेम के देवता मन्मथ यानी कामदेव को भेजा गया।


मन्मथ ने शिव पर अपने पुष्प बाण चलाए ताकि उनमें तीव्र यौन भावनाएँ उत्पन्न हों। छले जाने पर क्रोधित शिव ने अपनी तीसरी आँख खोली जिससे प्रेम के देवता भस्म हो गए। देवताओं और मन्मथ की पत्नी रति देवी ने शिव से मन्मथ को जीवन देने का अनुरोध किया। शिव शांत हुए और रति की बात मानकर मन्मथ को बिना शरीर के जीवित कर दिया और अपनी सभी शक्ति और क्षमताओं से संपन्न एक बच्चे को जन्म देने के लिए माता पार्वती से विवाह करने के लिए तैयार हो गए।


भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख से 6 चिंगारी निकाली, जिन्हें अग्नि के देवता सरवण नदी के ठंडे पानी में ले गए जिससे 6 बच्चों का जन्म हुआ। इन बच्चों में से 5 लड़की थीं और 1 लड़का। ये लड़का कोई और नहीं बल्कि स्कंद यानी के कार्तिकेय ही थे, जिनके 6 मुख और 12 हाथ थे। जैसे-जैसे कार्तिकेय बड़े होते गए वैसे-वैसे वह एक महान और चतुर बुद्धि वाले योद्धा के रूप में विकसित हुए। बड़े होने के बाद उन्होंने ताड़कासुर के खिलाफ युद्ध शुरु कर दिया। कार्तिकेय और तारकासुर के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसके बाद कार्तिकेय ने तारकासुर का गला काटकर उसका वध कर दिया। तारकासुर की लाश से एक मोर उत्पन्न हुआ जिसे कार्तिकेय ने अपना वाहन बना लिया।


तारकासुर के वध के बाद सभी देवी-देवता प्रसन्न हो गए और उन्होंने कार्तिकेय जी को देवताओं का सेनापति घोषित कर दिया।  कार्तिकेय ने शुक्ल पक्ष की षष्ठी में ही तारकासुर का वध किया था। जिसके बाद इस तिथि को स्कंद षष्ठी के नाम से मनाया जाने लगा। 


स्कंद षष्ठी का व्रत क्यों किया जाता है ?


जो दंपत्ति संतानहीन हैं, उनको स्कंद षष्ठी का व्रत रखकर भगवान कार्तिकेय की पूजा करनी चाहिए। मान्यता के अनुसार इस दिन कार्तिकेय की पूजा करने से संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। 

स्कंद षष्ठी का व्रत रखने से आप पर माता लक्ष्मी की कृपा बरसती है, जिससे आपके जीवन में धन और वैभव की कमी नहीं होती।  

इसके अलावा संतान की लंबी आयु और शत्रुओं को पराजित करने के लिए भी स्कंद षष्ठी का व्रत रखा जाता है।


स्कंद षष्ठी का पौराणिक महत्व :

स्कंद षष्ठी का वर्णन कई पौराणिक कथाओं और धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। स्कंद पुराण के नारद-नारायण संवाद में संतान प्राप्ति और संतान की पीड़ाओं का शमन करने वाले इस व्रत का विधान बताया गया है। इस विधान के तहत उपवास करके षष्ठी के दिन कार्तिकेय की पूजा करनी चाहिए। 14वीं शताब्दी में लिखे गए संस्कृत ग्रंथ ‘निर्णयामृत’ में  बताया गया है कि - भाद्रपद की षष्ठी को कार्तिकेय की पूजा करने से से ब्रह्महत्या जैसे विशाल पापों से मुक्ति मिल जाती है। निर्णयामृत 14वीं-16वीं शताब्दी का संस्कृत भाषा का ग्रंथ है, जो हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों के लिए शुभ समय निर्धारित करने के बारे में अल्लादनाथ द्वारा लिखा गया है। इसके अलावा ब्रह्म पुराण में बताया गया है कि बच्चों के स्वास्थ्य के लिए सभी शुक्ल षष्ठियों पर भगवान भगवान कार्तिकेय की पूजा की जानी चाहिए।


स्कंद षष्ठी पूजा का शुभ मुहूर्त :

भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि की शुरुआत 08 सितंबर को रात 07 बजकर 58 मिनट पर होगी। वहीं  इस तिथि का समापन 09 सितंबर को रात 09 बजकर 53 मिनट पर होगा। ऐसे में स्कंद षष्ठी का पर्व 09 सितंबर को मनाया जाएगा।  


ऐसे करें भगवान कार्तिकेय की पूजा:


1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद सूर्य देवता की पूजा कर उन्हें अर्घ्य दें।

2. इसके बाद गंगाजल का छिड़काव कर घर को शुद्ध करें।

3. गंगाजल छिड़कने के बाद सबसे पहले भगवान गणेश और नवग्रहों  की पूजा करें। 

4. इसके बाद एक चौकी लगाकर उस पर लाल रंग का शुद्ध कपड़ा बिछाएं और उसके ऊपर भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा को स्थापित कर दें।

5. व्रत का संकल्प लेने के बाद कार्तिकेय देवता को वस्त्र, इत्र, चंपा के फूल, आभूषण, दीप-धूप और नैवेद्य अर्पित करें। भगवान कार्तिकेय का प्रिय पुष्प चंपा है इस वजह से इस दिन को स्कंद षष्ठी, कांडा षष्ठी के साथ चंपा षष्ठी भी कहा जाता है। 

6. समस्त पदार्थों को कार्तिकेय जी के समक्ष अर्पित करने के बाद इस मंत्र का जाप करें  - “ॐ स्कन्द शिवाय नमः 

7. अंत में भगवान कार्तिकेय की आरती करें और उनकी तीन बार परिक्रमा करें। 

8. इसके बाद कार्तिकेय जी को प्रणाम कर आसान के नीचे जल छोड़कर आरती और प्रसाद ग्रहण करें।


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