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जब निर्वस्त्र होकर नहा रहीं गोपियों को नटखट कन्हैया ने पढ़ाया मर्यादा का पाठ

भगवान विष्णु ने रामावतार लेकर जगत को मर्यादा सिखाई और वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। वहीं कृष्णावतार में भगवान ने ज्यादातर मौकों पर मर्यादा के विरुद्ध जाकर अपने अधिकारों की रक्षा और सच को सच कहने साहस हम सभी को दिखाया। दो अलग-अलग अवतार में भगवान दो अलग-अलग जीवनशैली के पक्ष में संदेश देते हुए मानव जीवन के लिए आदर्श स्थापित कर गए। 


भक्त वत्सल की जन्माष्टमी स्पेशल सीरीज ‘श्रीकृष्ण लीला’ के आठवे एपिसोड में आज हम आपको कान्हा के एक किस्से के बारे में बताएंगे जिसमें उन्होंने गोपियों को मर्यादा का पाठ पढ़ाया था….


एक बार की बात है। अधिकमास में माता कात्यायनी के व्रत के पूजन के लिए गोपियां सुबह के समय यमुना तट पर स्नान के लिए गई थीं। इस समय सूर्य देवता नहीं निकले थे तो अंधेरा ही था। ऐसे में गोपियों ने यमुना में निर्वस्त्र होकर स्नान करना शुरू कर दिया। सभी ने अपने कपड़े तट पर रख दिए और स्नान करने लगी। तभी श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ वहां पहुंच गए और तट पर रखे गोपियों के कपड़े उठाकर कदम के एक वृक्ष पर सबसे ऊपर जाकर बैठ गए। 


गोपियां हाथ जोड़कर कान्हा से वस्त्र मांगने लगी


अभी तक गोपियों को इस बात की भनक तक नहीं लगी थी। लेकिन जब वे नहाकर नदी से बाहर आईं तो उन्होंने देखा कि उनके वस्त्र उस जगह पर नहीं है। पहले तो गोपियों ने इधर-उधर कपड़े ढूंढें, लेकिन थोड़ी देर में ही उन्हें पता चला कि उनके कपड़े तो वृक्ष पर बैठे श्रीकृष्ण के पास है। उन्होंने कान्हा से अपने वस्त्र देने को कहा। पहले तो सभी गोपियां कान्हा को डराने-धमकाने की कोशिश करती रहीं, लेकिन जब कन्हैया ने उनकी एक न सुनी तो सभी हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए अपने वस्त्र मांगने लगी।


श्रीकृष्ण ने गोपियों से वचन लिया 


अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुमने यमुना में निर्वस्त्र उतरकर उनका अपमान किया है और यह मर्यादा के हिसाब से भी गलत है। तुम्हें इस तरह स्नान नहीं करना चाहिए था। तब कान्हा ने गोपियों से वचन देने के लिए कहा कि वे आगे से कभी भी नदी में निर्वस्त्र होकर स्नान नहीं करेगी और हमारी शिकायत हमारे घर पर हमारी माताओं से भी नहीं करेंगी। गोपियों की हालत मरता क्या न करता वाली थी। उन्होंने कन्हैया की हर शर्त मान ली। सभी ने कान्हा को वचन दिया। इसके बाद श्रीकृष्ण ने उनके वस्त्र लौटाए। इस तरह कन्हैया ने यमुना जी का मान रखते हुए गोपियों को मर्यादा का पाठ पढ़ाया।

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