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ऋषि पंचमी व्रत कथा (Rishi Panchami Vrat Katha)

(भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को किया जाने वाला व्रत)


श्री ऋषिपंचमी व्रत कथा (भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को किया जाने वाला व्रत) राजा सुताश्व ने कहा कि हे पितामह मुझे ऐसा व्रत बताइये जिससे समस्त पापों का नाश हो जाये। तब ब्रह्माजी ने कहा- राजन् मैं तुम्हें यह व्रत बताता हूँ जिससे समस्त पाप विनाश को प्राप्त होंगे। यह ऋषिपंचमी का व्रत है जिसके करने से नारी जाति के तमाम पाप दूर होकर वे पुण्य की भागी होती हैं। इसके लिए तुमसे एक पुरातन कथा कहता हूँ कि विदर्भ देश में उत्तंक नाम के एक सदाचारी ब्राह्मण निवास करते थे। उनकी पतिव्रता नारी सुशीला से एक पुत्री और एक पुत्र का जन्म हुआ।


 पुत्र सुविभूषण ने वेदों का सांगोपांग अध्ययन किया। कन्या का समयानुसार एक सामान्य कुल में विवाह कर दिया, पर विधि के विधान से वह कन्या विधवा हो गई, तो वह अपने सतीत्व की रक्षा पिता के घर रह करके करने लगी। एक दिवस कन्या माता-पिता की सेवा करके एक शिलाखण्ड पर शयन कर रही थी, तो रात भर में उसके सारे शरीर में कीड़े पड़ गए। सुबह तब कुछ शिष्यों ने उस कन्या को अचानक इस दशा में देख उसकी माता सुशीला से निवेदन किया कि माता गुरु-पुत्री के दुःख को देखिये। गुरु पत्नी ने जाकर पुत्री को देखा और उस अपनी पुत्री की अचानक यह दशा देखकर नाना तरह से विलाप करने लगी और पुत्री को उठाकर ब्राह्मण के पास लाई। ब्राह्मण भी पुत्री की दशा देखकर अति विस्मय को प्राप्त हुए, और दुःखी हुए। 


तब ब्राह्मण से हाथ जोड़कर कहा, महाराज! क्या कारण है कि इस पुत्री के सारे शरीर में कीड़े पड़ गए ? तब महाराज ने ध्यान धरके देखा तो पता चला कि इस पुत्री ने सात जन्म पहले ब्राह्मणी थी तो एक दिन रजस्वला होते हुए भी घर के तमाम बर्तन, भोजन, सामग्री, छूली और ऋषिपंचमी व्रत को भी अनादर से देखा, उसी दोष के कारण इस पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ गये क्योंकि रजस्वला (रजोधर्म) वाली नारी प्रथम दिन चांडाली के बराबर व दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी के समान व तीसरे दिन धोबिन के समान शास्त्र दृष्टि से मानी जाती है। तुम्हारी कन्या ने ऋषिपंचमी व्रत के दर्शन अपमान के साथ किये, इससे ब्राह्मण कुल में जन्म तो हुआ, पर शरीर में कीड़े पड़ गए हैं। तब सुशीला ने कहा, महाराज ऐसे उत्तम व्रत को आप विधि के साथ वर्णन कीजिए, जिससे संसार के प्राणीमात्र इस व्रत से लाभ उठा सकें। ब्राह्मण बोले हे सहधर्मिणी ! यह व्रत भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को धारण किया जाता है। 


पंचमी के दिन सुन्दर नदी में स्नान कर व्रत धारण कर सायंकाल सप्तर्षियों का पूजन विधान से करना चाहिए। भूमि को शुद्ध गौ के गोबर से लीप के उस पर अष्ट कमलदल बनाकर सप्तऋषियों की स्थापना कर प्रार्थना करनी चाहिए। महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ इन सात महर्षियों की स्थापना कर आचमन, स्नान, चंदन, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजन कर व्रत की सफलता की कामना करनी चाहिए। इस व्रत को करके उद्यापन की विधि भी करनी चाहिए। चतुर्थी के दिन एक बार भोजन करके पंचमी के दिन व्रत आरम्भ करे। सुबह नदी या जलाशय में स्नान कर गोबर से लीपकर सर्वतोभद्र चक्र बनाकर उस पर कलश स्थापन करे। कलश के कण्ठ में नया वस्त्र बाँधकर पूजा-सामग्री एकत्र कर अष्ट कमल दल पर सप्तऋषियों की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करे। फिर षोड्षोपचार से पूजन कर रात्रि को पुराण का श्रवण करें फिर सुबह ब्राह्मण को भोजन दक्षिणा देकर संतुष्ट करें। इस प्रकार इस व्रत का उद्यापन करने से नारी सुन्दर रूप लावण्य को प्राप्त होकर सौभाग्यशाली होकर धन व पुत्र से संतुष्ट हो उत्तम गति को प्राप्त होती है। 


द्वितीय कथा-दूसरी कथा भविष्य पुराण में इस प्रकार आती है कि एक बार महाराज कृष्ण से महाराज युधिष्ठिर ने कहा कि वह कौन पंचमी है जिसके करने से नारी जाति दोष से मुक्त हो करके महत् पुण्य को प्राप्त होती है आप मुझे संक्षेप में श्रवण कराइए। तब भगवान् कृष्णजी ने कहा, राजन् ! भाद्रपद मास की शुक्लपक्ष की पंचमी को सप्त ऋषियों का व्रत रहने से नारी रजस्वला दोष से मुक्त होती है। क्योंकि जब इन्द्र ने वृत्रासुर को मारा था, तब ब्रह्महत्या का एक भाग नारी के रज में, दूसरा नदी के फेन में, तीसरा भाग पर्वतों में, चौथा भाग अग्नि की प्रथम ज्वाला में विभक्त किया था। इससे हर जाति की नारी रजस्वला होने पर प्रथम दिन चांडाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे दिन धोबिन की तरह दोषी होती है। इससे उस दिन प्रति वस्तु छूने से अपवित्र होने का दोष होता है।


 इस ऋषिपंचमी व्रत के करने से वह दोष मुक्त होकर नारी पवित्रता को प्राप्त होती है। हे राजन् ! विदर्भ देश में एक श्येनजित नाम का राजा था। उसी राज में एक सुमित्र नाम का विद्वान् ब्राह्मण था, उसकी पत्नी का नाम जयश्री था। एक दिन वह रसोई घर में रजस्वला धर्म को प्राप्त हो गई फिर भी वह समयानुसार भोजन आदि वस्तु छूती रही। मृत्यु समय पाकर दोनों पति-पत्नी की मृत्यु हुई। मरने पर ब्राह्मणी को कुतिया का जन्म हुआ, और ब्राह्मण को बैल का जन्म लेना पड़ा। पर, इन दोनों को अपने तप के प्रभाव से पूर्व जन्म की बातों का स्मरण बना रहा तथा यह दोनों प्राणी अपने ही पुत्र के घर में पुनः जन्मे । एक दिन पितृ पक्ष में ब्राह्मण कुमार ने अपने पिता की श्राद्ध तिथि में विधि के साथ ब्राह्मण भोज रखा और अपनी पत्नी से स्वादिष्ट पकवान खीर आदि बनवाकर तैयार कराई। 


भाग्यवश एक साँप ने उस खीर में जहर उगल दिया। यह हाल वह ब्राह्मणी कुतिया बनी देख रही थी, तो उसने सोचा कि अगर ब्राह्मण खायेंगे तो मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे, इससे मेरे लड़के को हत्याओं का भारी पाप लगेगा। इससे उस खीर को कुतिया ने जान-बूझकर जूठा कर दिया। तब उस बहू ने कुतिया को इतनी मार मारा कि उसकी कमर तोड़ दी और खीर फेंककर दूसरी बना ली। फिर श्राद्ध कर सब ब्राह्मणों को भोजन कराया। रात को कुतिया ने जाकर अपने पूर्व बैल से दिन में होने वाली सारी घटना बताई, तो बैल भी बोला - प्रिये! तुम्हारे पाप के संसर्ग से आज मुझे बैल होना पड़ा है। आज मेरे लड़के ने दिन भर मेरा मुँह बाँधकर मुझे जोता है और अभी तक एक मुट्ठी घास भी नहीं डाली। यह सारी बातें वह ब्राह्मण बालक भी सुन रहा था सुनकर वह बड़ा दुःखी हुआ। तब माता-पिता को भोजन देकर वह दुःखी मन से चला गया। उसने ऋषियों को दंडवत् करके पूछा, महाराज मेरे माता-पिता कुतिया व बैल की योनि में हैं, वह किस प्रकार इस योनि से छुटकारा पा सकेंगे? ऋषियों ने बताया तुम्हारे माता-पिता ने रजोधर्म दोष से कुतिया व बैल का जन्म पाया है। अबकी बार तुम विधिपूर्वक इस उत्तम व्रत ऋषिपंचमी का करके उसका फल अपने माँ बाप को समर्पण करना, जिससे वे पशु-योनि से मुक्त होकर स्वर्ग प्राप्त करेंगे।


 मुनियों से विधि सुनकर ब्राह्मण पुत्र ने इस व्रत को स्त्री सहित विधि के साथ सर्वान्न सहित भाद्रपद शुक्ल पंचमी को ऋषि पंचमी का यह व्रत किया और श्रद्धा से व्रत का फल अपने माता-पिता को समर्पण किया जिसके प्रभाव से वे इस क्रूर योनि से छूटकर दिव्य देव- विमान पर आरुढ़ हो स्वर्ग को प्राप्त हुए। हे राजन् ! जो स्त्री इस व्रत को विधि के साथ करके श्रद्धा से सप्तर्षियों का पूजन करती है वह नारी इस भयंकर दोष से छूटकर शीघ्र ही धन, पुत्र-पौत्र आदि सुख-सौभाग्य रूप को पाती हैं। इस व्रत को करना नारी जाति का मुख्य कर्तव्य है। इससे तन, मन आदि के दोष मुक्तहोते हैं। जो-जो फल तीर्थों के करने से प्राप्त होते हैं, वे इस व्रत से अनायास नारी जाति को मिलते हैं। 


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