क्यों रखते हैं रवि प्रदोष व्रत

रवि प्रदोष व्रत क्यों रखा जाता है? जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा



हिंदू पंचांग के अनुसार, फरवरी महीने का पहला प्रदोष व्रत माघ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाएगा। यह तिथि शुरुआत 9 फरवरी 2025, रविवार के दिन पड़ेगी और इसी दिन व्रत करना फलदायी होगा। रविवार के दिन पड़ने की वजह से इस व्रत को रवि प्रदोष कहा जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो भी श्रद्धालु विधि-पूर्वक इस व्रत को करता है उसे सुख-समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है। तो आइए, इस आर्टिकल में विस्तार से जानते हैं कि रवि प्रदोष व्रत क्यों किया जाता है और इसके पीछे की क्या वजह है।  

क्यों मनाया जाता है रवि प्रदोष व्रत?

  
एक बार ऋषि समाज द्वारा सर्व प्राणियों के हित में परम पावन भागीरथी के तट पर विशाल गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस सभा में व्यास जी के परम शिष्य पुराणवेत्ता सूतजी महाराज हरि कीर्तन करते हुए पधारे। सूतजी को आते देख शौनकादि के 88,000 ऋषि-मुनियों ने खड़े होकर उन्हें दंडवत प्रणाम किया। महाज्ञानी सूतजी ने भक्तिभाव से ऋषियों को हृदय से लगाया और उन्हें आशीर्वाद दिया। विद्वान ऋषिगण और सभी शिष्य आसन पर विराजमान हो गए।

मुनिगण श्रद्धा से पूछने लगे कि “हे परम दयालु! कलिकाल में शंकर की भक्ति किस आराधना द्वारा उपलब्ध होगी। क्योंकि, कलयुग के सर्व प्राणी पाप कर्म में रह रहकर वेद शास्त्रों से विमुख रहेंगे।”

ऐसा सुनकर दयालु हृदय से सूतजी ने कहा कि “श्रेष्ण मुनि और शौनक जी आप धन्यवाद के पात्र हैं आपके विचार प्रशंसनीय और सराहनीय हैं। आप वैष्णव अग्रगण्य हैं, क्योंकि आपके हृदय में सदा परहित की भावना समाहित है। इसलिए हे शौनकादि ऋषियों सुनो मैं उस व्रत के बारे में बताता हूं, जिससे करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। 
धन वृद्धि, दुख विनाशक, सुख प्राप्त कराने वाला, संतान देने वाला और मनोवांछित फल की प्राप्ति कराने वाला व्रत होता है वह व्रत तुमको सुनाता हूं।” 

यह किसी समय भोलेनाथ ने सती जी को सुनाया था और उनसे प्राप्त यह परमश्रेष्ठ उपदेश मेरे पूज्य गुरुजी ने मुझे सुनाया था। जिसे समय पाकर आपको मैं सुना रहा हूं। इसके बाद सूतजी ने आगे बताया कि भक्त आयु, वृद्धि, स्वास्थ्य लाभ के लिए त्रयोदशी का व्रत करें। इसमें सुबह स्नान कर निराहार रहें। और शिव मंदिर में जाकर भोलेनाथ की पूजा करें। पूजा के बाद अर्द्ध पुण्ड का त्रिपुण्ड तिलक धारण करें। शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाएं। धूप, दीप और अक्षत से पूजा करें। शिवजी को ऋतु फल अर्पित करें। 'ऊँ नमःशिवाय' मंत्र का रुद्राक्ष की माला से जाप करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं और सामर्थ्यनुसार दान-दक्षिणा दें। इसके बाद मौन व्रत रखें। व्रती को सत्य बोलना आवश्यक है। इस व्रत में हवन आहुति भी देनी चाहिए।

प्रदोष व्रत की दूसरी कथा 


श्रीसूत जी ने संतों को आगे बताया कि एक गांव में अति दीन ब्राह्मण निवास करता था। उसकी पत्नी प्रदोष व्रत किया करती थी और उसका एक पुत्र था। एक बार, उसका पुत्र गंगा स्नान करने के लिए गया था। मार्ग में उसे चोरों ने घेर लिया और वह कहने लगे कि हम तुझे मारेंगे, नहीं तो तू अपने पिता का गुप्त धन बतलादे।बालक दीन भाव से कहने लगा कि हम अत्यंत दुखी दीन है। हमारे पास धन कहा हैं? चोर फिर कहने लगे कि तेरे पास पोटली में क्या बंधा है? बालन ने उत्तर दिया की मेरी माता ने मुझे रोटी बनाकर बांध दिया है। दूसरा चोर बोला कि भाई यह तो अति दीन-दुखी हृदय है, इसे छोड़ दे। 

बालक यह बात सुनकर वहां से चला गया और एक नगर में पहुंचा। नगर के पास एक बरगद का पेड़ था। बालक थककर वहां बैठ गया और पेड़ की छाया में सो गया। उस नगर के सिपाही चोरों की खोज कर रहे थे और वह बालक के पास आ गए। 

सिपाही बालक को चोर समझकर राजा के पास ले गए और राजा ने उसे कारावास की आज्ञा दे दी। उधर बालक की मां शंकर जी का प्रदोष व्रत कर रही थी। उसी रात राजा को स्वप्न आया कि यह बालक चोर नहीं है, सुबह होते ही छोड़ दो नहीं तो आपका राज्य-वैभव जल्द ही नष्ट हो जाएगा। रात समाप्त होने पर राजा ने उस बालक से पूरी कहानी पूछी और बालन ने सारी कहानी बताई। 

बालक की बात सुनकर राजा ने सिपाही को भेजकर माता-पिता को बुला लिया। राजा ने जब उन्हें भयभीत देखो तो कहा कि तुम चिंता मत करो,तुम्हारा बालक निर्दोष है। हम तुम्हारी दरिद्रता देखकर पांच गांव दान में देते हैं। शिव की दया से ब्राह्मण परिवार अब सुखी रहने लगा। इस प्रकार से जो कोई इस व्रत को करता है उसे जीवन में सुख की प्राप्ति होती है।

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