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गल मोत्यां को हार, सिर चुनड़ चमकदार (Gal Motiyan Ko Haar Sir Chunad Chamakdar)

गल मोत्यां को हार,

सिर चुनड़ चमकदार,

थे कर सोलह श्रृंगार,

माँ बनड़ी सी लागो जी,

माँ बनड़ी सी लागो जी ॥


थारे हाथा सोणी चंगी,

माँ मेहंदी रची सुरंगी,

चुडले की खन खन न्यारी,

झांकी थारी सतरंगी,

मन मेरो मोह लियो है,

थारी पायल की झंकार,

गल मोत्या को हार,

सिर चुनड़ चमकदार,

थे कर सोलह श्रृंगार,

माँ बनड़ी सी लागो जी,

माँ बनड़ी सी लागो जी ॥


थारे माथे बिंदिया चमके,

नथनी में हीरो दमके,

थारे देख देख कर दादी,

भक्ता को मनडो हरखे,

जादू सो चढ़ गयो है,

मैं भूली माँ घर बार,

गल मोत्या को हार,

सिर चुनड़ चमकदार,

थे कर सोलह श्रृंगार,

माँ बनड़ी सी लागो जी,

माँ बनड़ी सी लागो जी ॥


थाने ‘स्वाति’ निरखन ताई,

थारे मन्दरिये में आई,

कवे ‘हर्ष’ देख कर थाने,

सुध बुध सारी बिसराई,

पलभर ना हटे निजरा,

मैं निरखु बारम्बार,

गल मोत्या को हार,

सिर चुनड़ चमकदार,

थे कर सोलह श्रृंगार,

माँ बनड़ी सी लागो जी,

माँ बनड़ी सी लागो जी ॥


गल मोत्यां को हार,

सिर चुनड़ चमकदार,

थे कर सोलह श्रृंगार,

माँ बनड़ी सी लागो जी,

माँ बनड़ी सी लागो जी ॥

बांके बिहारी तेरे नैना कजरारे, नजर ना लग जाए (Banke Bihari Tere Naina Kajrare Nazar Na Lag Jaye)

बांके बिहारी तेरे नैना कजरारे,
नजर ना लग जाए,

ब्रह्मन्! स्वराष्ट्र में हों, द्विज ब्रह्म तेजधारी (Brahman Swarastra Mein Hon)

वैदिक काल से राष्ट्र या देश के लिए गाई जाने वाली राष्ट्रोत्थान प्रार्थना है। इस काव्य को वैदिक राष्ट्रगान भी कहा जा सकता है। आज भी यह प्रार्थना भारत के विभिन्न गुरुकुलों व स्कूल मे गाई जाती है।

जगत में कोई ना परमानेंट(Jagat Me Koi Na Permanent)

जगत में कोई ना परमानेंट,
जगत में कोई ना परमानेंट,

काशी के कोतवाल काल भैरव

काशी के राजा भगवान विश्वनाथ और कोतवाल भगवान काल भैरव की जोड़ी हिंदू पौराणिक कथाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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