नवीनतम लेख

कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे (Kabhi Fursat Ho To Jagdambe)

कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे,

निर्धन के घर भी आ जाना ।

जो रूखा सूखा दिया हमें,

कभी उस का भोग लगा जाना ॥


ना छत्र बना सका सोने का,

ना चुनरी घर मेरे टारों जड़ी ।

ना पेडे बर्फी मेवा है माँ,

बस श्रद्धा है नैन बिछाए खड़े ॥

इस श्रद्धा की रख लो लाज हे माँ,

इस विनती को ना ठुकरा जाना ।

जो रूखा सूखा दिया हमें,

कभी उस का भोग लगा जाना ॥


कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे,

निर्धन के घर भी आ जाना ।


जिस घर के दिए मे तेल नहीं,

वहां जोत जगाओं कैसे ।

मेरा खुद ही बिछौना डरती माँ,

तेरी चोंकी लगाऊं मै कैसे ॥

जहाँ मै बैठा वही बैठ के माँ,

बच्चों का दिल बहला जाना ।

जो रूखा सूखा दिया हमें,

कभी उस का भोग लगा जाना ॥


कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे,

निर्धन के घर भी आ जाना ।


तू भाग्य बनाने वाली है,

माँ मै तकदीर का मारा हूँ ।

हे दाती संभाल भिकारी को,

आखिर तेरी आँख का तारा हूँ ॥

मै दोषी तू निर्दोष है माँ,

मेरे दोषों को तूं भुला जाना ।

जो रूखा सूखा दिया हमें,

कभी उस का भोग लगा जाना ॥


कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे,

निर्धन के घर भी आ जाना ।

जो रूखा सूखा दिया हमें,

कभी उस का भोग लगा जाना ॥

भक्तो का कल्याण करे रे, मेरा शंकर भोला (Bhakto Ka Kalyan Kare Re Mera Shankar Bhola)

भक्तो का कल्याण करे रे,
मेरा शंकर भोला,

दशा माता की कथा (Dasha Maata Ki Katha)

सालों पहले नल नामक एक राजा राज किया करते थे। उनकी पत्नी का नाम दमयंती था। दोनों अपने दो बेटों के साथ सुखी जीवन जी रहे थे।

इष्टि पौराणिक कथा और महत्व

इष्टि, वैदिक काल का एक विशेष प्रकार का यज्ञ है। जो इच्छाओं की पूर्ति और जीवन में शांति लाने के उद्देश्य से किया जाता है। संस्कृत में 'इष्टि' का अर्थ 'यज्ञ' होता है। इसे हवन की तरह ही आयोजित किया जाता है।

सतगुरु मैं तेरी पतंग(Satguru Main Teri Patang)

सतगुरु मैं तेरी पतंग,
बाबा मैं तेरी पतंग,

यह भी जाने