कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि

Krishna Janmashtami Puja Vidhi: जन्माष्टमी ऐसे करें श्रीकृष्ण की पूजा, प्रसन्न होंगे कान्हा 


सनातन धर्म में भाद्रपद माह को सभी माह में विशेष माना जाता है। इस माह को भगवान कृष्ण के जन्म से जोड़ा गया है। पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर कन्हैया का जन्मोत्सव मनाया जाता है। उनका जन्म इस तिथि पर रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इस दिन भगवान कृष्ण के बाल रूप की पूजा की जाती है। ऐसे में लड्डू गोपाल की पूजा करने से विशेष कृपा की प्राप्ति होती है। इसी कड़ी में आइए, जन्माष्टमी पूजा विधि के बारे में विस्तार से जान लेते हैं।


जन्माष्टमी पूजन विधि


  • सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • भगवान को नमस्कार कर व्रत का संकल्प लें। संकल्प के लिए हाथ में जल, फल, कुश और गंध लें।
  • हाथ में जल लेकर सभी पूजन सामग्री एवं स्वयं को आसन सहित शुद्ध करें।


शुद्धि मंत्र:


ओम अपवित्रः पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोअपि वा।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।


  • जल को स्वयं पर और पूजन सामग्री पर छींटे लगाकर पवित्र करें। इसके बाद विधि-विधानपूर्वक पूजा आरंभ करें।
  • पूजा के लिए पूरब या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
  • बाल गोपाल का श्रृंगार कर उन्हें एक चौकी पर लाल रंग के आसन पर विराजित करें। भगवान को पीतांबर वस्त्र पहनाना उत्तम माना जाता है।


श्रीकृष्ण ध्यान मंत्र:


वसुदेव सुतं देव कंस चाणूर मर्दनम्।
देवकी परमानंदं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।


इस मंत्र का जप कर भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें और फूल उनके चरणों में अर्पित करें।


  • नारियल या खीरे को बीच से चीरकर उसमें लड्डू गोपाल को स्थापित करें।
  • रात 12 बजे शुभ मुहूर्त में उन्हें खीरे से निकालकर पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, गंगाजल व शक्कर) से स्नान कराएं।
  • भगवान कृष्ण को यज्ञोपवीत पहनाकर, चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप से पूजन करें और झूले में विराजमान करें।


जन्माष्टमी पूजन संकल्प मंत्र:


‘यथोपलब्ध पूजनसामग्रीभिः कार्य सिद्धयर्थं कलशाधिष्ठित देवता सहित, श्रीजन्माष्टमी पूजनं अहं करिष्ये।’


हाथ में पान का पत्ता, कम से कम एक रुपये का सिक्का, जल, अक्षत, फूल, फल लेकर इस संकल्प मंत्र का उच्चारण करें, फिर हाथ में रखी हुई सामग्री भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित करें।


भगवान श्रीकृष्ण आवाहन मंत्र:


अनादिमाद्यं पुरुषोत्तमोत्तमं श्रीकृष्णचन्द्रं निजभक्तवत्सलम्।
स्वयं त्वसंख्याण्डपतिं परात्परं राधापतिं त्वां शरणं व्रजाम्यहम्।।


बिना आवाहन किए भगवान की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। आवाहन का अर्थ भगवान को बुलाना होता है। जब हम भगवान को बुलाते हैं, तभी वे पूजा को स्वीकार करते हैं। इसलिए पूजन से पहले आवाहन करना आवश्यक है।


भगवान को भोग अर्पित करें


  • भगवान को मक्खन, मिश्री, पंजीरी, फल, मेवे एवं अन्य पकवान अर्पित करें।
  • नैवेद्य में तुलसी दल का समावेश अनिवार्य माना गया है।
  • साथ ही, लौंग, इलायची, और पान भी अर्पित करें।
  • पूजन के साथ ही श्रीकृष्ण के मंत्रों का जप एवं स्तोत्र का पाठ करें।

इस प्रकार विधि-विधान से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है, और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।


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