नमामि-नमामि अवध के दुलारे(Namami Namami Awadh Ke Dulare)

नमामि-नमामि अवध के दुलारे ।

खड़ा हाथ बांधे मैं दर पर तुम्हारे ॥


न करता हूं भक्ति न जप योग साधन ।

कैसे कटेंगे यह माया के बंधन ॥

दुःखी दीन हो के यह मनवा पुकारे ॥


नमामि-नमामि अवध के दुलारे ।

भंवर में पड़ी आ के नैया यह मेरी ।

सहारा न दूजा है इक आस तेरी ॥

तू बन के खिवैया लगा दे किनारे ॥

नमामि-नमामि अवध के दुलारे ।


मैं कामी हूं क्रोधी हूं लोभी अवारा ।

लिया नाम दिल से कभी न तुम्हारा ॥

दया कर क्षमा कर तू बख्श बख्शन हारे ॥

नमामि-नमामि अवध के दुलारे ।


बिनती यही है प्रभु के चरण में ।

आये हैं हम सब तुम्हारी शरण में ॥

करो दूर अवगुण जो होवें हमारे ॥

नमामि-नमामि अवध के दुलारे ।

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वाक् देवी हे कलामयी हे सुबुद्धि सुकामिनी (Vak Devi He Kalamayee He Buddhi Sukamini)

वाक् देवी हे कलामयी
हे सुबुद्धि सुकामिनी

अनंग त्रयोदशी व्रत कथा

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को अनंग त्रयोदशी कहा जाता है। अनंग त्रयोदशी व्रत प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है।

भक्तो के द्वार पधारो (Bhakto Ke Dwar Padharo)

भक्तो के द्वार पधारो,
प्यारे गौरी के ललन,

मोहे मिठो मिठो, सरजू जी को पानी लागे(Mohe Mitho Mitho Saryu Ji Ko Pani Lage)

सीता राम जी प्यारी राजधानी लागे,
राजधानी लागे,

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